प्रिय पाठकों “रायगढ़ का सफरनामा” के इस अंक में आपका स्वागत है।
राजस्व विभाग में मौखिक आदेशों के पालनार्थ मातहत कर्मचारियों पर मानसिक दबाव
इस बात से इनकार नहीं है कि रायगढ़ में विकास कार्य बहुत तेजी से और बहुत अच्छे तरीके से मॉनिटर होते हुए संपन्न कराए जा रहे हैं। परंतु ऊपर का दबाव जब प्रशासन के आला अधिकारियों पर पड़ता है तो वह अपने मातहत कर्मचारियों को भी मौखिक आदेश देकर उसका पालन करने हेतु उन पर दबाव डालते हैं। अब जो छोटा कर्मचारी है उसके पास कोई और रास्ता नहीं है तो वह भी फील्ड में जाकर उन मौखिक आदेशों का पालन करते हुए मौखिक निर्देश ही देता है। यानि कोई भी कर्मचारी अपनी कलम फसाना नहीं चाहता। पटवारी नहीं चाहता कि अकेले उसकी कलम फंसे ,पटवारी के हल्के में ना तो चांदा मुनारा है ना वो प्रकट चिन्ह उसके नक्शे में कटा है जिससे सही नाप कर पा रहा है। और ना ही उसका दिल गवाही दे रहा है कि यह नाप सही हो रही है तब वह अपनी रिपोर्ट बनाने से दूरी बना लेता है या फिर सही सही रिपोर्ट बनाता है। उसे मालूम है कि जिस दिन भी मामला सिविल कोर्ट में जाएगा तो तकलीफ उसी की होनी है ऊपर के साहब एक डेढ़ साल में आएंगे चले जाएंगे।
अब इसी मुद्दे तीन प्रकरण आपके सामने में रखता हूं।
प्रकरण क्रमांक 1:- अभी एक प्रकरण के दस्तावेज देखने से पता चला कि पटवारी और सीमांकन दल ने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की कि वादी के जमीन पर प्रतिवादी का कब्जा है। इसकी भनक लगते ही प्रतिवादी ने रातों-रात वादी की बचत जमीन के और हिस्से पर भी कब्जा करना शुरू कर दिया जबकि उसे पता है कि उसकी भूमि नाले में चली गई है। वादी ने राजस्व विभाग के समक्ष गुहार लगाई विभाग ने दस्तावेजों के आधार पर यह पाया कि वादी की भूमि पर तो पहले से ही कब्जा दिखाई दे रहा है उन्होंने प्रतिवादी के विरुद्ध स्टे आर्डर दे दिया। स्टेऑर्डर के बाद भी काम नहीं रुका और वादी की बचत भूमि पर भी कब्जा हो गया। वादी पुलिस के पास पहुंचा पुलिस ने फेना थमा दिया।
अब प्रतिवादी न केवल राजनीतिक पहुंच रखने का दावा करता है बल्कि उसके पास इस्तेमाल करने के लिए धन भी मौजूद है। उसने दोनों अस्त्रों का इस्तेमाल किया और कुछ इधर उधर के तथ्य लिख कर अपने जवाब में मुख्य बात में सिर्फ इतना लिखा कि मैंने अपनी ही जमीन पर कब्जा किया है मैंने किसी और की जमीन पर कब्जा नहीं किया है। विभाग ने बिना जांच पड़ताल के, बिना स्थल निरीक्षण कराये अपने दिए हुए स्टे पर न्यायालय की अवमानना न लगाते हुए यह कह कर कि वादी ने संलग्न भूमि के मालिक के साथ-साथ कब्जा करने में उनके परिजनों का नाम भी लिख दिया है। इसलिए यह आवेदन त्रुटि पूर्ण है। और राजस्व विभाग के आरआईऔर पटवारी ने जो नाप की है उसमें उन्होंने प्रारम्भिक बिंदु का जिक्र नहीं किया है जहां से नाप शुरू की थी और जहां पर नाप उन्होंने खत्म की है इस लिये 7 लोगों के दल ने त्रुटि की है।
ना ही वादी को कुछ और सबूत पेश करने का अवसर दिया गया और ना प्रतिवादी ने कोई दस्तावेज और अपने जमीन के सीमांकन की कोई रिपोर्ट पेश की, और प्रकरण खारिज कर दिया गया। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि प्रतिवादी के उन्ही परिजनों ने जिनका नाम प्रकरण में लिखा गया है सीमांकन पंचनामे में यह लिखा है कि जब तक मेरी जमीन की नाप नहीं की जाती तब तक यह सीमांकन उसे स्वीकार्य नहीं है। फिर ना तो वह अपनी जमीन का सीमांकन आवेदन लगाता है और ना ही कोई सीमांकन रिपोर्ट प्रस्तुत करता है, जिससे यह साबित हो कि वह अपनी जमीन पर ही काबिज है। ऐसे में आखिर जनता करे तो करे क्या ?
यह प्रकरण एक मिसाल है की राजस्व विभाग किस तरह से काम करता है । क्या प्रदेश का राजस्व विभाग इतना बड़ा लाव लश्कर लेकर इसीलिए बैठा है कि वह किसी का झगड़ा निपटाने की जगह झगड़े को और बढ़ा दे और वह भी उस जिले में जहां का विधायक स्वयं कलेक्टर रह चुका है और वर्तमान में एक कद्दावर मंत्री के रूप में राज्य शासन का हिस्सा है। और जनता उन पर आंख मूंद कर भरोसा करती है कि जब तक वह है उनके साथ कोई अन्याय नहीं होगा।
प्रकरण क्रमांक 2 :- एक संस्था को शासकीय भूमि बिना सीमांकन के ही प्रदान कर दी गई उन्होंने उस पर निर्माण भी कर लिया अब उनकी नजर संलग्न जमीन पर पड़ी उन्होंने शासकीय खर्चे से उस जमीन पर भी निर्माण कार्य के लिए आवेदन लगाया जबकि वह भूमि निजी भूमि है। भूमि मालिक जब वहां पर अपनी आपत्ति के साथ पहुंचता है तो राजस्व का अमला उसे नाप कर नहीं बता पाता कि कहां से उन्होंने इस भूमि का सीमांकन किया और उसका आरंभिक बिन्दु कहां पर आ रहा है। अब यहां पर मौखिक आदेशों का सिलसिला चालू हो गया ऊपर का दबाव अफसर पर, अफसर का दबाव नीचे के कर्मचारी पर और अब वह कर्मचारी यह कहता है कि भाई मैं कुछ नहीं कर सकता ऊपर से दबाव है। अब प्रश्न उठता है कि बिना सीमांकन के शासकीय भूमि कैसे आवंटित कर दी गयी। आसपास के भूमि मालिकों को क्यों नहीं बुलाया गया ,बिना सीमांकन रिपोर्ट के उस पर नक्शा कैसे पास हुआ, बिना वैध प्रपत्रों के संबंधित एजेंसी ने वहां पर कैसे निर्माण कर दिया। बिना सीमांकन रिपोर्ट के दोबारा निर्माण आबंटन आवेदन कैसे स्वीकार हुआ उस पर प्रशासनिक स्वीकृति कैसे प्राप्त हुई?
अब मरता क्या ना करता यहां पर आपत्तिकर्ता ने पूरी छानबीन करने के बाद राजस्व विभाग को बताया कि आपने संस्था को जिस जमीन का आवंटन किया है उसका आधा हिस्सा तो बगल निर्माण में दबा हुआ है अब यदि बगल वाले निर्माण ने आधा हिस्सा अपने पास रख लिया है तो फिर क्या आवंटित भूमि को निजी भूमि से जमीन दे दी जाएगी? पर यह कमाल छत्तीसगढ़ के राजस्व विभाग में अमूमन होता आया है जब उन्होंने यह तर्क सही पाया तो यह कहा है कि आपत्तिकर्ता भी अपनी जमीन का सीमांकन करवा ले। आपत्तिकर्ता ने सीमांकन आवेदन लगाया और सीमांकन का आदेश भी हो गया सीमांकन के लिए हलके के पटवारी ने यह लिख कर दे दिया कि जमीन के सीमांकन में एक पूरा दल गठित किया जाए। और आपत्तिकर्ता से कहा कि हम इस सीमांकन को बहुत दूर प्रकट चिन्ह से मिलाते हुए नाप करेंगे तभी पता चलेगा की कितनी भूमि संलग्न निर्माण में चली गई है। और आवंटित भूमि में से कितनी भूमि वहां पर बच रही है। तभी यह निर्धारित होगा कि आपकी भूमि कहां से शुरू होती है और कहां खत्म होती है।
अब यहां पर दोनों प्रकरणों का विरोधाभास देखिए एक प्रकरण में राजस्व विभाग यह कहकर प्रकरण खारिज करता है कि सीमांकन दल ने सीमांकन करते समय यह त्रुटि की है कि उसने सीमांकन के लिए बिंदु निर्धारण का कोई ठोस प्रमाण नहीं दिया है। और दूसरे प्रकरण में ऊपर से नीचे तक मौखिक आदेश चल रहे हैं और बिना सीमांकन के ही आपतिकर्ता को मानसिक रूप से दबाव डाला जा रहा है कि वह शासन के काम में हस्तक्षेप ना करें और उसकी निजी भूमि भी जा रही हो तो वह चुप रहे।
प्रकरण क्रमांक 3 :- पाठकों को याद होगा कि कुछ दिनों पहले एक पूरा परिवार पेट्रोल की बोतल लेकर जिला कार्यालय के बाहर धरने पर बैठ गया था। उनका आरोप था कि उनकी भूमि पड़ोसी ने कब्जा कर ली है और उनकी सुनवाई नहीं हो रही है। जबकि वह मुख्यमंत्री जनदर्शन और कलेक्टर जनदर्शन में भी आवेदन प्रस्तुत कर चुके थे। मुख्यमंत्री जनदर्शन से भी संबंधित अधिकारी को पत्र आया था और उसमें तत्काल जांच के आदेश दिए गए थे परंतु जैसे ही वे लोग धरने पर बैठे प्रशासन सक्रिय हुआ अधिकारी वहां पहुंचे, और समझा बुझाकर उन्हें आश्वासन दिया गया कि उनके जमीन की नाप होगी और यदि किसी ने उस पर कब्जा किया है तो उसे हटाया जाएगा। परंतु रात गई बात गई दूसरे दिन से ना तो कोई कार्यवाही हुई ना नाप हुई आज उस घटना को लगभग 20-22 दिन हो रहे हैं परंतु किसी प्रकार की कोई पहल नहीं है। यहां भी वही धौंस पट्टी काम कर रही है कि हमारी पहुंच तो ऊपर तक है ।अब पता नहीं यह ऊपरवाला कौन है?
क्या इसी दिन के लिए संविधान ,कानून , न्यायालय, राजस्व विभाग, प्रशासनिक अधिकारीयों की नियुक्ति की जाती है? क्या कानून नाम की धारणा अब छत्तीसगढ़ और विशेष कर रायगढ़ में अपना अस्तित्व खो चुकी है? क्या मौखिक आदेश सर्वोपरि है ? यह एक ज्वलंत प्रश्न है। न जाने कितने लोग इस पीड़ा को भुगत रहे हैं, एक तरफ मुख्यमंत्री का ऐलान होता है की राजस्व विभाग में पारदर्शिता बढ़ती जाएगी दूसरी तरफ हर टीएल बैठक में विभिन्न जिलों कलेक्टर द्वारा राजस्व विभाग को निर्देशित किया जाता है कि वह सही-सही प्रकरणों का निराकरण करें। प्रति सप्ताह पेपर में सेम टू सेम खबर छपती है। और फिर अगले दिन से ही लिखा पढ़ी बंद और मौखिक आदेश चालू ,,,,,,,जनता में अब एक भय का वातावरण बन रहा है कि वे सुरक्षित नहीं है कभी भी कोई भी सरकारी आदेश उनकी संपत्ति पर मौखिक रूप से लागू हो सकता है। क्योंकि अब रायगढ़ में लिखित का प्रचलन बंद हो चुका है।
चलते-चलते
12 साल के केंद्रीय शासन को आज GEN Z के नाराजगी को झेलना पड़ रहा है। उनके सारे कदम सारी कार्यवाहियां उनके खिलाफ जा रही हैं क्योंकि भारत का संविधान अजर अमर है। यहां का कानून एक पूजनीय ग्रंथ है। प्यार से भी लोगों को वश में किया जा सकता है, मीठी जुबां से भी लोग दीवाने हो सकते हैं। आपके कार्य की सराहना आपको खुद नहीं करनी चाहिए उसे जनता के ऊपर छोड़ दें, आपके कार्य सराहना के लायक होंगे तो निश्चित ही हर व्यक्ति उसकी मुक्त कंठ से सराहना करेगा। आपके विकास कार्य आपकी कार्यप्रणाली की गवाही देंगे ऐसे में जननायक बनने की जगह पता नहीं देश का नेतृत्व क्यों अपनी छवि एक शासक के रूप में खड़ी करना चाहता है। कोई भी काम भय की जगह प्रेम,सौहाद्र,भाईचारे, बातचीत और एक दूसरे को सम्मान देकर भी हो सकता है। और देश का हर व्यक्ति देश के नवनिर्माण में विभिन्न टैक्स इसीलिए देता है कि उसका देश आगे बढ़ता रहे उसके इस राष्ट्र प्रेम को सम्मान मिलना चाहिए तो वह और भी तन मन धन से देश के नव निर्माण में सहयोग करेगा।
आपकी इस मुद्दे पर क्या राय है जरूर लिखिएगा,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
Author: हीरा मोटवानी
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