जीवन दायिनी केलो नदी को संकरा और नालियों और बरसाती नालों को चौड़ा करने की मुहिम
रायगढ़ में इन दिनों कई स्थानों पर नालियों को चौड़ा करने का काम जारी है पर उसमें लैंडस्कैपिंग नाम की इंजीनियरिंग कहीं नहीं दिखती क्योंकि यह सब तो रायगढ़ में होता ही नहीं है । यहां तो खोदो और ढलाई कर ऊपर से ढक्कन लगा दो, ठेकेदार को सिर्फ इतना ही काम करना होता है। उसके बाद पानी निकले ना निकले जाम हो जाए इस पर कोई विचार नहीं होता। क्योंकि आने वाली सरकार के मंत्री अधिकारी ठेकेदार आखिर क्या करेंगे वह भी आएंगे नाली को और चौड़ा करना पड़ेगा फिर से खोदो ढलाई करो बड़ा ढक्कन लगाओ। और शासकीय अधिकारी तो इस काम में निपुण होते हैं कि कैसे भी करके हर कार्य का बजट बढ़ाना है जो काम ₹100 में हो सकता है उसे ₹1000 तक खींच के ले जाना है।
रायगढ़ में केलो नदी के दोनों ओर सड़क चौड़ी करके नदी की चौड़ाई कम की जा रही है और शहर की सारी नालियां चौड़ी बनाई जा रही है। इसी क्रम में प्रस्तावित मेडिकल कॉलेज मार्ग चौड़ीकरण के कार्य में एक 55 फुट का बरसाती नाला जो साल भर सूखा पड़ा रहता है उसे 216 फुट चौड़ा करके उस पर उच्च स्तरीय पुल बनाना है। जिसमें करोड़ों की लागत लगनी चाहिए। वह पानी निकालने के लिए नहीं बल्कि लागत बढ़ाने के लिए बन रहा है। और इस तरीके से बनाया जा रहा है कि ताकि जरूरत पड़ने पर वीआईपी का हेलीकॉप्टर भी उसके ऊपर उतर सके।
जब फ्रंट फेस न्यूज़ ने एक जानकार व्यक्ति से पूछा की क्या एक बरसाती नाले पर इतना बड़ा पुल जरूरी है तो उन्होंने व्यंग्य करते हुए कहा की भाई आजकल के ट्रिपल इंजन सरकार में 500 साल बाद की कल्पना के अनुसार चार मंजिल वाली एंबुलेंस चलने लायक रोड बनाए जा रहे हैं, इसीलिए इस पुल को वर्तमान पुल की ऊंचाई से भी 15-16 फुट ऊपर बनाया जा रहा है ताकि संबलपुर हीराकुद डैम, केलो डैम और राजिम, धमतरी के गंगरेल डैम का पानी एक साथ छोड़ा जाए तो भी वह इस नाले से निकल जाए भले ही यह नाला केवल बालसमुंद तालाब से जुड़ा है पर तैयारी हिंद महासागर की करनी है।
रायगढ़ कि सभी सड़कों का चौड़ीकरण प्रस्तावित है
कहते हैं बकरे की अम्मा कब तक खैर मनाएगी एक न एक दिन तो उसके कटने का वक्त आता ही है। रायगढ़ की सकरी सड़कों को चौड़ा करने की मुहिम फाइलों में तो मूर्त रूप ले चुकी है पर यथार्थ में यह कब संभव होगा यह नहीं पता। लोग बड़े खुश हैं की वह शासन को साथ में ले कर घूम रहे हैं। वह खुश है की नए-नए वैकल्पिक मार्ग बनने के बाद शायद शहर के सड़कों को चौड़ा न करना पड़े पर उन्हें यह नहीं मालूम है कि यह प्रस्ताव तो लगभग डेढ़ साल पहले ही पारित हो चुके हैं और धीरे-धीरे इस पर काम भी शुरू किया जाएगा क्योंकि इसके बिना ट्रैफिक समस्या का कोई हल नहीं है ।आज किसी भी कार्यक्रम या त्योहार के समय सीमित संसाधनों से युक्त पुलिस बल केवल ट्रैफिक कंट्रोल करने में ही जुटा रहता है । अन्य अपराधों की रोकथाम के लिए उनके पास समय ही नहीं बचता, फिर भी रायगढ़ की पुलिस रात दिन एक करके अपराधों पर नियंत्रण भी कर रही है और ट्रैफिक व्यवस्था को भी दुरुस्त कर रही है। यह तारीफ के काबिल है, यह सब एक सुलझे हुए पुलिस अधीक्षक शशि मोहन सिंह के कार्य प्रणाली का ही कमाल है । वरना यही पुलिस थी और यही नागरिक थे और यही अपराधों की एक श्रृंखला थी। शहर वासी यह मानते हैं की एसपी साहब की पुलिसिंग व्यवस्था दुरुस्त है।
चलते चलते
रायगढ़ में भूमि सीमांकन एक दुष्कर कार्य है। पहले तो कार्यालयीन कार्यवाही में ही जान निकल जाती है, फिर सीमांकन दल का इकट्ठा होना फिर उनके पास संसाधनों की कमी फिर यदि जमीन पर किसी और का कब्जा पाया जाता है तो सीमांकन दल कभी भी स्पष्ट उल्लेख नहीं करता है। क्योंकि उन्हें ऐसा लगता है कि उन्हें तो रायगढ़ में ही रहना है और कौन व्यक्ति कब किसी वीआईपी का सगे वाला निकल जाए कहा नहीं जा सकता। इसलिए वह अपनी रिपोर्ट गोल-गोल घुमा देते हैं जिसके कारण सिविल प्रकरणों की संख्या बढ़ रही है और पक्षकार कोर्ट कचहरी के चक्कर लगा रहे हैं। जबकि आज के इस इलेक्ट्रॉनिक तकनीक के युग में जहां पर कई तरीके ऐसे हैं जिसे सीमांकन लगभग सही हो सकता है । दो तीन फुट की बात अलग है बाकी लगभग सही होता है उसे स्पष्ट रूप से लिखकर देना चाहिए ताकि पीड़ित पक्षकार उस लिखित दस्तावेज के सहारे माननीय न्यायालय के समक्ष जा सके। यहां विशिष्ट रूप से उल्लेखित है कि पुसौर तहसील का हाल सबसे खराब है वहां कोई काम नहीं होता महीनों महीनों सीमांकन पेंडिंग रहते हैं। रायगढ़ कलेक्टर को इस और ध्यान देना चाहिए ताकि आम जनता को सुविधा मिल सके।
पुलिस हस्तक्षेप की अत्यंत आवश्यकता है
भूमि विवादों में अक्सर पीड़ित पक्ष कर सही होने के बाद भी अपनी भूमि पर काबिज नहीं हो पाता क्योंकि सामने वाला व्यक्ति या तो बाहुबली होता है, या किसी नेता का चमचा होता है, और या फिर एक धूर्त और कपटी व्यक्ति होता है, ऐसे में पुलिस को हस्तक्षेप करके पीड़ित के अधिकारों की सुरक्षा करनी चाहिए। परंतु ऐसा नहीं होता है पुलिस एक फैना काटकर अपने कर्तव्यों से इति श्री कर लेती है। माननीय उच्चतम न्यायालय का स्पष्ट फैसला है कि पुलिस को हस्तक्षेप करना चाहिए नए कानून बीएनएस और बीएनएसएस में बहुत सी धाराएं एसी हैं जिसमें पुलिस के पास बहुत ज्यादा अधिकार है। वे चाहे तो पीड़ित की मदद कर सकते हैं और उन्हें करना चाहिए। एसपी साहब से निवेदन है कि वह इस मामले पर संज्ञान ले और एक दो भू माफिया पर कार्यवाही करें। जिससे कि पूरे शहर में यह संदेश जा सके कि किसी की भी जमीन पर कब्जा करने पर अब कैद भी हो सकती है।
Author: हीरा मोटवानी
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