सिंधी समुदाय का मकर पर्व लाल लोई आज
लाल लोई भत में डोई ठारे ठारे खा …
रायगढ़। मकर संक्रांति के पूर्व संध्या पर जिस तरह पंजाबी समुदाय लोहड़ी का पर्व मनाता है ठीक उसी तरह सिंधी समुदाय भी इसे लाल लोई और तिरमूरी पर्व के नाम से पूरे उत्साह के साथ मनाता है। अखंड भारत में पंजाब और सिंध क्षेत्र आपस में मिले होने के कारण यहां के त्योहारों में भी काफी समानता है बस क्षेत्र के अनुसार उनके नाम बदल गये हैं।
इस संबंध में जानकारी देते हुए आरएसएम महिला विंग प्रभारी श्रीमती पूनम मोटवानी ने बताया कि बढ़ते आधुनिक संसाधनों की दौड़ में यह त्यौहार अपनी पौराणिक परंपराओं से हटकर आयोजित हो रहे हैं परंतु उत्साह आज भी पूर्व की तरह है। लाल लोई नकारात्मक शक्तियों के अंत और सकारात्मक शक्तियों के आव्हान का दिन है कहा जाता है कि माघ माह के मध्य में जब सूर्य देव उत्तरायण होते हैं तो भगवत गीता के अनुसार भगवान श्री कृष्ण अपने पूरे वैभव और सभी कलाओं के साथ अपने पूर्ण स्वरूप में भक्तों को दर्शन देते हैं।
पहले लाल लोई के लिए एक बड़े मैदान में गड्ढा खोदा जाता था जो बच्चे स्वयं अपने हाथों से मेहनत कर बनाते थे लेकिन अब मैदान नहीं होने के कारण ईंट का घेरा लगाकर और उसके अंदर गोबर लिपाई करने के बाद लकड़ी का ढेर पिरामिड के आकार में सजाया जाता है। पहले इस पर्व के लिए बच्चे छत्तीसगढ़ी त्यौहार छेरछेरा की तरह अपने समुदाय के हर घर में जाकर लकड़ी और प्रसाद के पैसे एकत्रित करते थे उस वक्त वे एक गीत गाते थे , लाल लोई भत में डोई ठारे ठारे खा पंजणी डींदीअ धीय जमंदय डहड़ी डींदीअ पुट्र जमंदुय। उस वक्त पैसे की वैल्यू थी इसलिए इसका अर्थ यह था की लाललोई पर सिंधी व्यंजन भत को डोई यानि लकड़ी कि कड़छी से निकाल कर ठंडा करके खाओ और पांच पैसा दोगे तो पुत्री प्राप्त होगी और दस पैसा दोगे तो पुत्र प्राप्त होगा, यह एक आशीर्वाद गीत है ।
सिंधी व्यंजन भत इस त्यौहार का मुख्य व्यंजन होता है जो गेहूं के दलिया, शुद्ध घी, जीरा, काली मिर्च आदि के उपयोग से बनता है और इसमें पानी और गुड़ की मात्रा मिलाई जाती है यह एक मीठा व्यंजन है जो हर घर में प्रसाद के रूप में बनता है । पूरे समाज के लोग इस त्योहार के लिए स्वयं में ही आगे आते हुए बच्चों को पैसे और अन्य सामग्री उपलब्ध कराते हैं फिर सभी मिलकर शुभ मुहूर्त पर इन लकड़ियों में अग्नि प्रज्वलित करते हैं जिसके लिए गोबर के उपले का उपयोग होता है। तत्पश्चात आरती की थाली सजाकर सूर्य देव और अग्नि देव की आरती की जाती है तथा गाजर, रेवड़ी, नारियल, बुरी नजर से बचने के लिए पीली राई, सफेद तिल,काले तिल मूंगफली और गुड़ मूली समर्पित करते हैं । तत्पश्चात पल्लव प्रार्थना होती है फिर आयोलाल झूलेलाल की भजन धुन के साथ परिक्रमा की जाती है और अंत में परिवार के लिए पूरे समाज के लिए अग्नि देव से सूर्य देव से प्रार्थना की जाती है कि उनके आने वाले समय में वह उनकी न केवल रक्षा करें बल्कि उन्हें नकारात्मक शक्तियों से बचाएंगे। इसमें कुछ लोग मन्नत के सिक्के भी समर्पित करते हैं जिन्हें दूसरे दिन अग्नि के ठंडी होने के बाद उसे पवित्र लक्की क्वाइन के रूप में लोग अपनी तिजोरी या गल्ले में रखते हैं और छोटे बच्चों को तो गले में इसे ताबीज की तरह बांधकर पहनाया जाता है ।
दूसरे दिन प्रसाद के रूप में तिल और मूली को आपस में अड़ोस पड़ोस के घरों में बांटा जाता है और विवाहित बहनों और बेटियों के ससुराल में भी भेजा जाता है यह शुभ शगुन होता है। हालांकि परंपराएं समय के अनुसार बदलती रहती हैं लेकिन त्यौहार का जो आनंद हर वर्ष दिन प्रतिदिन बढ़ता ही रहता है यहां यह भी उल्लेखनीय है कि यदि हम अंग्रेजी कैलेंडर को देखें तो वर्ष प्रारंभ के बाद यह पहला त्यौहार रहता है जिसे आध्यात्मिक दृष्टि से अधिमास के अंत और सूर्य के उत्तरायण होने के लिए मनाते है आज से शुभ और मंगल कार्यों का आरंभ होता है। आप सभी को मकर संक्रांति, लोहड़ी, लाल लोई, तिरमूरी ,पोंगल, बीहू, पर्व की बहुत-बहुत शुभकामनाएं।
पूनम मोटवानी प्रभारी महिला विंग राष्ट्रीय सिन्धी मंच रायगढ़




