छोटे झाड़ और बड़े झाड़ के जंगल परिभाषित वन भूमि के अंग
प्रदेश में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का नहीं पड़ा कोई असर
रायगढ़ में तो बिल्कुल भी नहीं
रायगढ़ । दिनांक 12 दिसंबर 1996 को अविभाजित मध्य प्रदेश में राज्य सरकार द्वारा गहन विचार के उपरांत यह आदेश पारित किया गया की छोटे झाड़ के जंगल एवं बड़े झाड़ के जंगल परिभाषित वन भूमि के अंग माने जाएंगे । और यह भूमि वन संरक्षण अधिनियम 1980 के दायरे में आती है इसलिये दिनांक 13 जनवरी 1997 को बाकायदा इस आदेश को राज्य पत्र में प्रकाशित करने के साथ-साथ सभी जिलों को यह आदेश दिया गया की ऐसी भूमियों की कोई भी रजिस्ट्री नहीं होगी और ना ही कोई तबादला हो सकेगा। क्योंकि अधिनियम के अंतर्गत धारा 239 यह कहता है कि जंगल में किसी के भी कोई भूमि स्वामी अधिकार नहीं बनते ऐसे में विभिन्न प्रकरणों में परिवर्तित व्यवस्थापन और आवंटन को जिन्होंने भी निजी संपत्ति मानते हुए उसका विक्रय किया था उस पूरी कवायद को एक बड़ा घोटाला माना गया।
परंतु जैसा कि होता आया है राजनीति हमेशा नीति को प्रभावित करती है और यहां पर भी यही हुआ और नियम तो बना दिए गए पर पालन नहीं हो पा रहा था ऐसे में एक याचिका की सुनवाई के दौरान माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने अपनी टिप्पणी में कहा कि राज्यों में वन भूमि सिर्फ जंगलों के लिए होनी चाहिए और यदि किसी को आवंटित की गई है तो वह व्यक्ति जंगल से जुड़ा होना चाहिए और व्यक्ति या संस्था उस भूमि का उपयोग जंगल के ही संवर्धन के लिए करेगा. माननीय न्यायालय ने बाकायदा सभी राज्य सरकारों के लिए यह निर्देश जारी किए की यदि ऐसी कोई आवंटन पूर्व में हो चुके हैं तो ऐसी भूमियों को चिन्हाकित करते हुए जनहित में उन्हें वापस लिया जावे और उस भूमि वन भूमि की तरह विकास कार्य होने चाहिए। माननीय जस्टिस बी आर गवई जस्टिस अगस्टिन जॉर्ज मसीह और जस्टिस के विनोद चंद्रन जी के इस संयुक्त आदेश में एक साल के अंदर यानी 14 /05/ 2026 के पहले पहले ऐसे सभी भूमियों को वापस राज्य शासन के रिकॉर्ड में चढ़ा देना चाहिए था । परंतु ना तो छत्तीसगढ़ में इस बात का कोई असर हुआ और ना ही रायगढ़ जैसी जगह पर जहां इस प्रकार के प्रकरणों की भरमार है
तीन जजों की खंडपीठ ने अपने आदेश दिनांक 15/05/2025 में कहा कि “हम सभी राज्यों के मुख्य सचिवों और सभी केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासकों को यह निर्देश देते हैं कि वे विशेष जांच दल गठित करें ताकि यह जांच की जा सके कि राजस्व विभाग के कब्जे में मौजूद आरक्षित वन भूमि का कोई भी हिस्सा किसी निजी व्यक्ति/संस्था को वानिकी उद्देश्य के अलावा किसी अन्य उद्देश्य के लिए आवंटित किया गया है या नहीं
केंद्र सरकार के साथ साथ राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को भी निर्देश दिया जाता है कि वे ऐसी भूमि पर कब्जा रखने वाले व्यक्तियों/संस्थानों से भूमि का कब्जा वापस लेने और उसे वन विभाग को सौंपने के लिए कदम उठाएं। यदि यह पाया जाता है कि भूमि का कब्जा वापस लेना व्यापक जनहित में नहीं होगा, तो राज्य सरकारें/केंद्र शासित प्रदेश उन व्यक्तियों/संस्थानों से उक्त भूमि की वर्तमान लागत मूल्य वसूल करें जिन्हें वह आवंटित की गई थी और उक्त राशि का उपयोग वनों के विकास के उद्देश्य से करे।
हम सभी राज्यों के मुख्य सचिवों और सभी केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासकों को यह निर्देश देते हैं कि वे विशेष टीमें गठित करें ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि ऐसे सभी तबादले आज से एक वर्ष की अवधि के भीतर हो जाएं।
यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि इसके बाद ऐसी भूमि का उपयोग केवल वृक्षारोपण के उद्देश्य से ही किया जाना चाहिए।
उल्लेखनीय है कि रायगढ़ जिले के बहुत से गांव और शहरी इलाकों के तो सभी गांव की भूमि जो कि छोटे झाड़ के जंगल के मद की थी उसमें न केवल लोगों ने कब्जा कर लिया है बल्कि विधि विरुद्ध तबादला भी जिला प्रशासन ने उनके पक्ष में कर दिया है। जिसमें करोड़ों की वन भूमि निजी हाथों में पहुंच गई है और उसके कई टुकड़े करके बेच दी गई है। ऐसे में माननीय सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के अनुसार इसकी गहन जांच करवानी चाहिए और छोटे झाड़ के जंगल बड़े झाड़ के जंगल मद की सभी भूमियों को वापस शासकीय भूमियों में जोड़ा जाना चाहिए ।
Author: हीरा मोटवानी
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