जमीन का पट्टा तो दे दिया पर रिकॉर्ड में दर्ज नहीं किया
रायगढ़। रायगढ़ के राजस्व विभाग की मेहरबानी से एक नयी समस्या आम जनता महसूस कर रही है । रायगढ़ शहर के आसपास के कई गांव नगर निगम की सीमा में शामिल कर दिए गए हैं लेकिन राजस्व रिकॉर्ड में आज भी वह राजस्व ग्राम ही है साथ ही उनकी शासकीय भूमि नजूल मद में समाहित कर दी गई है। अब जो जमीन नजूल मद में समाहित की गई इनमें से धड़ाधड़ पट्टे भी दिए जा रहे हैं पर उन्हें नजूल रिकॉर्ड में दर्ज नहीं किया जा रहा और ना ही उसका बटांकन उस खसरे में दर्ज किया जा रहा है ,ना तो उसका नक्शा काटा जा रहा है और ना ही उसका रिकॉर्ड ऑनलाइन चढ़ाया जा रहा है। और तो और ऐसे भूमियों को परिवर्तित भूमि के रूप में भी दर्ज नहीं किया जा रहा है।
अब आप पट्टा लेकर धनबल का इस्तेमाल करते हुए बिना नक्शा पास कराये भी मकान निर्माण कर लीजिए आपको कोई कुछ नहीं कहेगा। अब ऐसे निर्माण पर कोई अंकुश नहीं है आप एक-एक इंच भूमि पर निर्माण कार्य कर लीजिए और चाहे तो अगल-बगल वालों की भूमि भी दबा दीजिए क्योंकि ना तो आपका सीमांकन हो रहा है ना आप पर कोई नियम कानून लागू है बस आपने पट्टा हासिल कर लिया है आप उस जमीन के राजा हैं।
यह अंधेरगर्दी केवल रहवासी भूमि के लिए नहीं है बल्कि सामाजिक एवं कमर्शियल उपयोग में आने वाली शहर की भूमियों का भी यही हाल है यहां तक की जो जमीन कांग्रेस के शासनकाल में नीलाम की गई थी उन पर भी यह नियम लागू नहीं हुआ और एक-एक इंच भूमि पर बड़े-बड़े निर्माण कर लिए गए। जिससे ऐसे ईमानदार उपभोक्ता जो अपनी जमीन पर नियमानुसार निर्माण कार्य करना चाहते हैं वह अपने आप को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। क्योंकि उन्हें तो केवल 55% भूमि पर ही निर्माण की इजाजत दी जा रही है परंतु ऐसी अंधेर गर्दी वाली भूमियों पर कोई नियम कानून लागू नहीं है।
हो सकता है कि शासन के उच्च अधिकारियों तक यह सूचना न पहुंची हो या फिर उनके संज्ञान में ना हो क्योंकि छत्तीसगढ़ में शासकीय जमीन का मालिक कलेक्टर नहीं बल्कि पटवारी होता है और निर्माण पर निर्णय निगम कमिश्नर नहीं बल्कि उसका भवन अधिकारी देता है और नगर निवेश तो आज भी गांधी जी ही संभाल रहे है । अब ये लोग जो चाहे कर सकते है जहां चाहे बनवा सकते है जहां चाहे निर्माण को गिरवा सकते है। इनके हाथ में बीरबल कि रस्सी है ।
वैसे तो जनता भी देख रही है कि रायगढ़ विधायक और आदरणीय वित्त मंत्री ओपी चौधरी की निगाह प्रशासन के सारे विभागों पर है क्योंकि वे स्वयं कलेक्टर रह चुके हैं। परंतु यह भी यथार्थ है कि एक अकेला व्यक्ति हर तरफ निगरानी नहीं रख सकता और जिसका फायदा उनके करीबी तथाकथित कार्यकर्ता और मातहत कर्मचारी ही उठाते हैं अब देखना होगा कि इस समस्या का हल वह कैसे और कब निकाल पाते हैं।



