कोई लौटा दे हमारे बीते हुए दिन………

कोई लौटा दे हमारे बीते हुए दिन………

रायगढ़। इस बार गर्मी ने ऐसा कहर ढाया  की लोगों के हौसले पस्त हो गए हैं। बिजली की आंख मिचौली और दिन के साथ साथ  रातों का तापमान बढ़ने के कारण लोग सोचने पर मजबूर हो गए हैं कि आखिर इसका जिम्मेदार कौन है । गौर से देखा जाए तो शासन प्रशासन के साथ-साथ इस दुर्गति का कारण हम नागरिक भी हैं।  हमने प्रकृति का ऐसा दोहन किया की प्रकृति ने हमें उसका जवाब देना शुरू कर दिया है।

अंधाधुंध औद्योगिकी करण

यदि हम 1989 के पहले के समय को याद करें तो हमारा जीवन बहुत ही सरल, आनंद दायक, और एक छोटे से कस्बे की सुगंध लिए हुए था।  परंतु जैसे ही उद्योगों का पदार्पण हुआ और चिमनियों का जमाना आया तो शहर की फिजाँ बदलने लगी, धीरे-धीरे बढ़ता धुआं आज जानलेवा कालिख से भरा हुआ है। चिमनियों का ताप से  हमारे क्षेत्र का तापमान कई डिग्री बढ़ गया।

खदानों  का बढ़ता कारवां

उद्योग आये तो खदानें बढ़ीं और फिर वहां से निकलने वाले कोयले की ढुलाई के लिए बढ़ते ट्रेलर और ट्रक न केवल वातावरण को प्रदूषित करते रहे बल्कि उनसे निकलने वाली गर्मी भी क्षेत्र की गर्मी में इजाफा करने लगी।  सड़क दुर्घटनाओं का अंबार लग गया  और हमारे अपने धीरे-धीरे इन दुर्घटनाओं के शिकार होते हुए कम होने लगे।

खदानों के लिए पेड़ों की कटाई

हमारा यह वन प्रदेश खदानों के लिए पेड़ कटाई के बाद मरुस्थल के रूप में तब्दील हो गया।  पेड़ कटते गए और धरती का सीना  चीर कर उसके गर्भ से कोयला निकालना पहाड़ों को काट कर गिट्टी ,लाइमस्टोन निकाले जाते रहे इस पर्यावरणीय असंतुलन के कारण इसका असर हमारे मौसम पर पड़ा और हम एक ठंडे क्षेत्र से एक गर्म क्षेत्र के रूप में तब्दील होते रहे।

बढ़ती आबादी का असर

काम बढ़ता गया आबादी बढ़ती गई, आबादी के साथ-साथ उसके साइड इफेक्ट भी बढ़ते गए शहर का विस्तार हुआ चारों तरफ कंक्रीट के रोड बने जहां-तहां बेतरतीब नालियां और गलियां बढ़ती चली गई, खंबे लगे बिजली कि खपत बढ़ी ।  गर्मी बढ़ती गई तो इक्विपमेंट भी बढ़ते गए कूलर और एसी  धड़ाधड़ लगने लगे यहां तक की हर घर में कई कूलर और कई ऐसी काम कर रहे हैं उनकी जो गर्मी उत्सर्जित हो रही है उससे भी वातावरण गर्म हो रहा है।

नदी नाले तालाब सूख गये 

उद्योग बढ़े आबादी बढ़ी  तो पानी की खपत भी बढ़ती गई । तालाब सूखे कूंए सूखे यहां तक की नदियां भी सूख गई परंतु हम फिर भी नहीं सुधरे और पवित्र जल को कचरे से पाटते गए।  अब जब कई जगह वाटर लेवल भी डाउन हो गया है तो आने वाले दिनों में पीने का पानी कैसे और कहां से लाएंगे इस पर कोई विचार नहीं किया जा रहा है।  शासन प्रशासन की भी अपनी एक लिमिट है और वह अपना काम कर रहे हैं पर जनता में जागरूकता नहीं है इसलिए आने वाले दिनों में पीने का पानी बहुत महंगा होने वाला है।

जीवन का स्वरूप बदला और दिनचर्या में परिवर्तन आ गया

जैसे-जैसे पैसा बढ़ता गया वैसे-वैसे आलस्य भी बढ़ता गया।  जो बाजार सुबह 7:00 बजे तक खुलकर ,सज धज कर तैयार हो जाता था आज 10:30 बजे तक खुलता है।  हमने अपनी दिनचर्या को ही खराब कर लिया पहले सुबह उठते थे तो नींद भी जल्दी आती थी अब 2:00 बजे तक लोग जाग रहे हैं और ऐसे में बिजली की खपत भी बढ़ रही है और बीमारियां भी बढ़ रही है।

कोई लौटा दे हमारे बीते हुए दिन

पुराना समय याद आता है जब सड़कों के दोनों किनारों पर विशालकाय छायादार वृक्ष होते थे, जो न केवल तापमान को कम करते थे बल्कि पथिकों के आराम करने की जगह होती थी।  पशु-पक्षियों का घरौंदा होता था।  कौवा, गौरैया, मैना, कोयल दिखती थी।  लोग छत पर और बाहर सोते थे और इन पेड़ों की हवाएं किसी कूलर और एसी की जरूरत महसूस नहीं होने देती थी।  थोड़ी गर्मी बढ़ती भी थी तो टेबल फैन चलने लगते थे। और बड़े आराम से लोग गप्पबाजी करते हुए परिवार के साथ सोते थे।

जब बिजली बंद होती थी तो अड़ोस पड़ोस के लोग चबूतरो और खटिया पर बैठकर घंटों वार्तालाप किया करते थे।  पर कोई बिजली के दफ्तर पर नहीं जाता था, इंतजार करता था कि अपने आप बिजली आएगी।  सुबह होते ही दुकान हो या घर पानी का छिड़काव होता था शाम ढलते ही फिर से एक बार छिड़काव किया जाता था। लगभग घरों के बाहर पशुओं के लिए पानी की व्यवस्था होती थी।

हर मोहल्ले में खेल के मैदान होते थे, हरी-हरी घास होती थी जहां बैठकर और पेड़ के नीचे चौपाल बना कर बुजुर्गवार  ताश खेलते थे और बच्चे विभिन्न खेलों का आनंद लेते थे, रेस टीप , विष अमृत, लट्टू, गिल्ली डंडा, कबड्डी, खो खो , दौड़, पिठूल आदि खेल होते थे। शाम के समय हर मोहल्ले से दर्जनों पतंग आसमान में छाई रहती थी बच्चे ज्यादा खुश होते तो किराए की साइकिल लेकर दौड़ाते थे और हाथ में साइकिल का रिंग या टायर लेकर डंडे के सहारे दौड़ते थे।  इस पूरे फिजिकल एक्टिविटी से उनका स्वास्थ्य भी अच्छा रहता था और मानसिक रूप से भी वह अत्यंत स्वस्थ रहते थे जिससे उनकी पढ़ाई भी बहुत अच्छी होती थी।

मोहल्ले में तेंदू, चार, इमली, सब्जियां,  बिना इंजेक्शन वाले फल आम केला संतरा बिकने के लिए आते थे। जिसमें कोई केमिकल नहीं होता था।  तरबूज और खरबूज ककड़ी यह तो हर घर की शाम 4:00 बजे की व्यवस्था रहती थी। बर्फ के गोले , शिकंजी कुल्फी गर्मियों कि शान थी , नल और बोरिंग का पानी पीते थे फिर भी स्वस्थ रहते थे।  सारे फल आम केला प्राकृतिक रूप से पके हुए आते थे जिसमें स्वाद भी होता था और पौष्टिकता भी होती थी ।

लोगों के बीच सौहार्द का वातावरण था और लोग एक दूसरे कि सहायता  के लिए सहज ही खड़े हो जाया करते थे समय बदला युग बदला सारी बातें सिर्फ कहानी बनकर रह गई पर कहते हैं कि इतिहास अपने आप को दोहराता है।  इसलिए मैं अपने शहर वासियों से यह अपेक्षा रखता हूं कि वह अपने बच्चों को पुरानी बातों से अवगत कराएं । उन्हें उस समय की बातें, किस्से ,घटनायें  बताएं और उनके मन में नए बदलाव का बीज रोपना शुरू करें।

सरकार से कहें  कि हमें कंक्रीट के फुटपाथ नहीं बल्कि मिट्टी के फुटपाथ चाहिए जिसमें छायादार पेड़ लगे हों ,जहां से पानी रिचार्ज होकर अंडरवाटर लेवल को भी बढ़ा दे और हमारे स्वास्थ्य पर भी इसका सकारात्मक असर हो। शासन के किसी भी विकास कार्य जो बिना किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित हुए किया जा रहा हो उसमें प्रशासन का साथ दें हालांकि यह अब संभव नहीं दिखता है क्योंकि वोट बैंक की राजनीति ने हम सब में बहुत अंतर ला दिया है।  सत्ता पक्ष हमेशा अपने लोगों को बचाता है और दूसरों पर अत्याचार करता है। पार्टी किसी की भी हो सत्ता किसी की भी हो मनोदशा यही होती है।

सुधार कि शुरुआत कहाँ से हो 

इसी कारण हमारा शहर बेढंगा , बेतरतीब ,कचरा युक्त है । सौहार्द से दूर एक दूसरे के प्रति जलन की भावना, टांग खींचने की कवायद  तेरी साड़ी मेरी साड़ी से सफेद कैसे की भावना, सामने वाला क्यों खुश है इस बात को लेकर बिना किसी कारण सामने वाले को परेशान करना, इनको हमें भूलना पड़ेगा यदि भूल सके तो फिर से हम एक बार उस स्वर्णिम युग में लौटने की तैयारी कर सकते हैं।  परंतु जब हम यह देखेंगे की पेड़ तो गांव में कट रहे हैं, खदानें तो गांव में खुद रही है, उद्योग तो शहर से दूर लग रहे हैं तो फिर हमें उससे क्या ? तो याद रखिए आप एक वहम में जी रहे हैं हम सभी एक अदृश्य भट्टी में  हैं और अपने बच्चों को भी इस अदृश्य भट्टी में झोंक कर इस फ़ानी दुनिया से विदा हो जाएंगे।  मर्जी आपकी यदि अब भी नहीं जागे तो फिर कभी नहीं जाग पाएंगे। हमें क्रांतिकारी नहीं बनना है, पर अपने हक के लिए आवाज उठाने की हिम्मत तो करनी ही पड़ेगी तभी हम आने वाली पीढ़ी को एक मार्गदर्शन देकर जाएंगे नहीं तो उन्हें गुलाम बनाने की तैयारी हो चुकी है।

Front Face News
Author: Front Face News

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