शासकीय भूमि पर कब्जे तो हट जाते हैं पर निजी भूमि के कब्जों पर शासन मेहरबान क्यों
रायगढ़। अभी आप सोशल मीडिया पर देख रहे होंगे की किस तरह दिल्ली, उत्तरप्रदेश ,बिहार के कई शहरों में अवैध कब्जों को हटाया जा रहा है परंतु छत्तीसगढ़ में छत्तीसगढ़ सरकार और प्रशासन का फोकस केवल शासकीय भूमि पर है। निजी भूमि के कब्जों को हटाने के लिए उनकी कोई प्रतिबद्धता नहीं है। भले ही पंजीयन शुल्क और भू भाटक के नाम पर आपसे पैसा वसूल किया जाता है। परंतु जब आपको न्याय की जरूरत पड़ेगी तो आपका साथ कोई भी राजस्व न्यायालय नहीं देता है। यहां पर किंतु, परंतु, जबकि, चूँकि, मालूम पड़ता है, समझ में आता है, जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है, और पीड़ित पक्ष कि पीड़ा को नज़रअंदाज करते हुए और पीड़ित करने का प्रयास किया जाता है। और कब्जेदार को फायदा पहुंचाने का प्रयास किया जाता है क्योंकि जाहीर है कब्जेदार से ही स्वार्थ सिद्ध हो सकता है । इसी परेशानी को देखते हुए केंद्र सरकार ने कानून में बदलाव किया लेकिन केंद्र सरकार यह नहीं समझ पाई की इन कानून को लागू करने वाले नीचे बैठे अफसर तो इसे जानते तक नहीं यहां तक की जो कर्मचारी ऑर्डर टाइप करते हैं उनका भी कहना है कि “हमन तो नी सुने हन, हमन तो अतकी दिन ले काम करत हन त इसनेच करथन “ अब आप क्या करोगे ।
केंद्र सरकार और माननीय उच्चतम न्यायालय यह समझते है कि उनके एक कानून बना देने से अथवा एक फैसला दे देने से नीचे तक लोग उसकी पालना करेंगे। वे कानून की आत्मा की बात करते हैं परंतु यहाँ कहा जाता है कि हमें तो यही सिखाया गया है यही बताया गया है और हम ऐसे ही काम करते थे करते रहेंगे। जब तक कि स्पष्ट रूप से हमारा मंत्रालय हमको कोई निर्देश नहीं देता तब तक हमारे ऊपर कोई दायित्व नहीं है।
लेकिन जनता को चिंता करने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए क्योंकि नए कानून के हिसाब से आप अपने ऊपर हुए किसी भी ज्यादती और विधि विरुद्ध आदेश को सक्षम न्यायालय में तो चुनौती दे ही सकते हैं साथ ही यदि आप यह सिद्ध कर पाए कि इसमें पीठासीन अधिकारी ने जानबूझकर कानून तोड़ मरोड़ कर, शब्दों का जाल फेंकते हुए आपके विरोधी पक्ष को फायदा पहुंचाया है तो अब इसे भी भ्रष्टाचार की श्रेणी में रखा गया है और बाकायदा आप इसकी शिकायत सक्षम एजेंसियों के पास कर सकते हैं जो इसकी जांच करेंगे और न केवल प्रकरण की जांच करेंगे बल्कि उस अधिकारी कर्मचारी के पूरी जन्म कुंडली को खंगाल सकते हैं।
उदाहरण के तौर पर माननीय उच्चतम न्यायालय और माननीय उच्च न्यायालय ने कई बार विभिन्न प्रकरणों में टिप्पणी की है की प्रकरण के मूल उद्देश्य की तरफ ध्यान देना चाहिए ,न्याय की तरफ ध्यान देना चाहिए, ना कि लिपिकीय त्रुटियों और प्रक्रिया जनित त्रुटियों की तरफ ध्यान देना चाहिए उनका कहना है कि व्यक्ति आपके पास न्याय लेने पहुंचा है जरूरी नहीं है कि वह एक-एक प्रक्रिया का अक्षरशः पालन कर पाए । लेकिन यदि वह यह सिद्ध करने में सक्षम है कि उसके साथ अन्याय हुआ है और वह पीड़ित पक्षकार है और विरोधी पक्ष ने उसके साथ ज्यादती की है तो ऐसे में पीठासीन अधिकारी को न्यायिक सिद्धांतों के अनुसार कुछ वाद प्रश्न अपने प्रकरण में लाने पड़ेंगे।
यहाँ उल्लेखनीय है कि पीठासीन अधिकारी को यह देखना चाहिये कि पीड़ित पक्षकार माननीय न्यायालय की शरण में क्यों पहुंचा ? क्या वह अपने दस्तावेजी साक्ष से प्रथमदृष्टया संस्थित करने में सक्षम रहा है कि उसके साथ अन्याय हुआ है? फिर अधिकारी को उस जांच रिपोर्ट पर भी गौर करना होगा जो उसने स्वयं अपने मातहत कर्मचारियों से कराई है। और फिर सुनवाई का अवसर देते हुए विरोधी पक्ष के तर्कों को भी सुनना होगा और यह देखना होगा कि विरोधी पक्ष केवल तर्क कर रहा है या फिर वह दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत कर रहा है। यदि वह कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर रहा है तो ऐसे में सुविधा का संतुलन ,न्याय का संतुलन किसके पक्ष में जा रहा है अधिकारी चाहे तो वादग्रस्त प्रकरण के सारे तथ्यों का स्वयं अवलोकन कर सकता है तत्पश्चात उसे निर्णय पर पहुंचना चाहिये ।
ऐसे में यदि कोई अधिकारी आपके अधिकारों का हनन कर रहा हो या फिर चतुराई करते हुए किसी तरह से विरोधी पक्ष को फायदा पहुंचाने का प्रयास कर रहा हो तो आप इसकी लिखित सूचना राज्य शासन केंद्र शासन और साथ ही साथ उन एजेंसियों को भी दे सकते हैं जो भ्रष्टाचार की जांच करती हैं । इस तरह आप अपने अधिकारों की सुरक्षा कर पाएंगे और नए कानून का लाभ भी ले पाएंगे।
यहां प्रश्न यह उठता है कि राज्य शासन क्यों इन नए कानून पर कार्यशालाओं का आयोजन नहीं कर रहा है? जबकि यह सबसे अहम कार्य होना चाहिए और सबसे प्रथम क्रम होना चाहिए कि वह इन नए कानून के लिए संबंधित अधिकारियों कर्मचारियों के ट्रेनिंग सेशन ले और उन्हें इस बारे में अवगत कराये ।
परंतु अफसोस राज्य शासन इस तरफ गंभीर नहीं है क्योंकि उसके पीछे उनकी या तो कोई मजबूरी है और या फिर कोई इच्छा पूर्ति का उद्देश्य है। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री माननीय विष्णु देव साय ने तो इन अधिकारियों, कर्मचारियों को पहले ही अमृत पान करा दिया है कि किसी भी सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ कोई एफ़आईआर नहीं होगी, ठीक है यदि उन्हें ऐसा लगता है तो ऐसा ही सही होगा, परंतु उनके मंत्रिमंडल द्वारा इस मुद्दे पर पहल होनी चाहिए कि इन अधिकारियों और कर्मचारियों पर भी कोई अंकुश या जवाबदारी निर्धारित हो। ताकि जो प्रशासनिक डंका बिहार में बज रहा है उत्तर प्रदेश में बज रहा है वह यहां पर भी बजे और ऐसा अपराध करने वालों को सबक मिल सके जो अपने बाहुबल और अपनी राजनीतिक धौंस का प्रदर्शन करके गरीबों और किसानों के साथ साथ आम जनता पर अत्याचार कर रहे हैं।


