क्या किसी संपत्ति विवाद में सभी वाद कारणों और पक्षकारों को एक साथ संयोजित करना आवश्यक है……

क्या किसी संपत्ति विवाद में सभी वाद कारणों और पक्षकारों को एक साथ संयोजित करना आवश्यक है……

रायगढ़।  माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने 11 जून 2026 को पारिवारिक संपत्ति विवाद के एक महत्वपूर्ण फैसले में टिप्पणी करते हुए कहा कि ” It be also observed that the effect of agreeing with the High Court would be that the appellant-plaintiff would be deprived of the entire property given to him by Mahabir Rai, and that has been in his name ever since he was born or shortly thereafter. The application of law, especially when it comes to inter family disputes is not akin to enforcing the black letter of the law but calls upon the Judge to understand the surrounding facts and circumstances and in the light thereof come to a conclusion in accordance with law. The part of the appellant- plaintiff’s right which was threatened was challenged so in effect, he through his guardians, was protecting his rights. There was no occasion to do anything further. When this is the reality, to apply a principle of law which would lead to an unduly harsh and unjust consequence, would be offensive to both law and equity in these circumstances. As such, the impugned judgment must be set aside. Ordered accordingly.

(Makardhwaj Ram vs Jagdish Rai)

(हिन्दी रूपांतरण )“यह भी देखा जाए की हाई कोर्ट से सहमत होने का असर यह होगा की अपील करने वाले वादी को महावीर राय द्वारा दी गई पूरी प्रॉपर्टी से वंचित कर दिया जाएगा।  जो उसके जन्म के समय से या उसके तुरंत बाद से उसके नाम पर है।  कानून का इस्तेमाल खासकर जब बात परिवार के बीच झगड़ों की हो तो कानून के काले अक्षरों को लागू करने जैसा नहीं है बल्कि जज से आसपास के तथ्यों और हालात को समझने और उनकी रोशनी में कानून के अनुसार किसी नतीजे पर पहुंचने की मांग करता है ।  अपील करने वाले वादी के अधिकार का वह हिस्सा जिसे खतरा था उसे चुनौती दी गई थी इसलिए असल में वह अपने अभिभावकों के जरिए अपने अधिकारों की रक्षा कर रहा था आगे कुछ करने का मौका नहीं था।  जब यह सच्चाई है तो कानून का ऐसा सिद्धांत लागू करना जिससे बहुत ज्यादा कठोर और गलत नतीजा निकले इन हालात में कानून और इक्विट (साम्य विधि सिद्धांत )दोनों के लिए गलत होगा ।”
हो सकता है कि इस फैसले के सारे तथ्य अलग हो परंतु इस टिप्पणी में ऊपर लिखे वाक्य ने यह तो निर्धारित कर दिया है की यदि किसी व्यक्ति के पास अपने प्रकरण को चलाने के लिए वर्तमान में किसी एक मुद्दे पर आपातकालीन परिस्थितियां बन गई है तो वह पहले उस मुद्दे को उठाकर अपने अधिकारों की सुरक्षा कर सकता है।  बाद में जब उसे उस समस्या से राहत मिलती है तो वह उस प्रकरण से संबंधित बाकी अन्य मुद्दों और पहलुओं पर, व्यक्तियों पर, पृथक से वाद संस्थित कर सकता है।  ऐसा नहीं है की आपको एक ही बार में सारे मुद्दे सारे पक्षकार एक साथ संयोजित करने होंगे।  हां यह जरूर है कि जिस मुद्दे पर आपने पहले वाद संस्थित  किया है, दूसरे वादों में उस मुद्दे को पुनः नहीं उठाया जा सकता है।  बशर्ते की पक्षकार अलग-अलग हो।
लेखक ने इस विषय पर विधि विशेषज्ञों से बात की तो उन्हें उत्तर मिला कि अभी तक रेस जुडिकेटा सिद्धांत को हर प्रकरण में फिट करके इसका अर्थ से अनर्थ निकाल कर प्रकरणों को समाप्त कर दिया जाता था ।  परंतु माननीय सर्वोच्च न्यायालय के इस टिप्पणी ने इस मार्ग को प्रशस्त किया है कि वास्तव में संपूर्ण प्रकरण के किसी एक मुद्दे और एक पक्षकार जिससे ज्यादा खतरा हो उसे पहले उठाने में और बाकियों पर बाद में कार्यवाही करने पर प्रकरण समाप्त करने में इस सिद्धांत का लाभ नहीं लिया जा सकता।
निवेदन ……..
विधि विशेषज्ञ अपनी राय कॉमेंट्स में जरूर लिखें ताकि उन पर विचार किया जा सके।
हीरा मोटवानी
Author: हीरा मोटवानी

frontfacenews@gmail.com

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